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(सार्थक जीवन के लिए)

भगवद गीता से जानने योग्य गहरा सार

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इस प्रकार विचलित होकर शक्तिशाली योद्धा अर्जुन एक शिष्य के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को शरणागत हो जाते है। तत्पश्चात, अशाश्वत शरीर और शाश्वत जीव के बीच की मौलिक विभिन्नता के बारे में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान शिक्षाएँ शुरू करते हैं। बाद में, शाश्वत जीव के (एक शरीर से दूसरे में) स्थानांतरीत की प्रक्रिया, नियत कर्तव्यों के रूप में की गई निस्वार्थ कार्यों (परब्रह्म की प्रसन्नता के लिए) और एक साक्षात्कारी व्यक्ति की विशिष्टताओं इनके बारे में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान समझाते हैं।

भ.गी. 2.1 – संजय ने धृतराष्ट्र से कहाः दया-भाव से अभिभूत हुआ अर्जुन को देखकर, आँसुओं से भरी हुई उनकी आँखें तथा शोक से वशीभूत हुआ उनका मन को देखकर, मधुसूदन (कृष्ण) ने निम्नलिखित शब्द कहे।

भ.गी. 2.2, 3 – पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहाः हे अर्जुन, तुम्हें संकट की घड़ी में ये विलाप कहाँ से आए? जीवन की वास्तविक उद्येश्य को जानने वाले व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता; यह तुम्हें उच्चतम स्थान पर नहीं ले जाएगा उलट बदनामी देगा।

भ.गी. 2.4, 5 – हे मधुसूदन! मैं कैसे भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे आदरणीय ज्येष्ठों पर अपने बाणों से पलटवार कर सकता हूं उनके प्राणों की कीमत पर जीने के बजाय भीख मांगकर जीना श्रेष्ठतर होगा। हालांकि वे सांसारिक-फ़ायदे के लिए आकांक्षा कर रहे हैं, वे अपने वरिष्ठ हैं। यदि उनकी हत्या होगी, तो जो भी हम उपभोग करेंगे वे सब खून से सने होंगे।

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भ.गी. 2.6, 7 – हे कृष्ण! इनमें से कौन सा श्रेष्ठतर होगा यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ – उन्हें जीतना? या उनसे पराजित होना? मैं अपनी छोटी सोच की दुर्बलता के कारण अपने नियत कर्त्तव्य के बारे में पूरी तरह भ्रमित हो चुका हूँ और पूरी तरह अपने मानसिक संयम खो चुका हूँ। इस परिस्थिति में आप से निश्चित रूप से मैं पूछ रहा हूं कि, मेरे लिए क्या श्रेष्ठतर होगा। मैं एक समर्पित शिष्य के रूप में आपको पूर्णतः शरणागत होता हूँ, कृपया मुझे निर्देश करें।

भ.गी. 2.8 – मेरी इंद्रियों को बलहीन करने वाले इस वेदना से उभरने के लिए मुझे कोई उपाय नहीं मिल रहा है । भले ही देवताओं के समान ख़ुशहाल और अद्वितीय राज्य मैं जीत भी जाऊं, फिर भी इसको मैं दूर नहीं कर पाऊँगा।

भ.गी. 2.9, 10 – (इस प्रकार कहते हुए) गुडाकेश (अर्जुन) ने कहा, “हे गोविंद! मैं युद्ध नहीं करूंगा”, और मौन हो गया। उसवक्त दोनों सेनाओं के बीच मुस्कुराते हुए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने शोकाकुल अर्जुन से इस प्रकार कहा।

भ.गी. 2.11 – पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान ने कहा: तुम एक विद्वान कि तरह बाद करेंगे भी तुम ऐसी बात के लिये शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं है। एक विद्वान न तो जीवितों के लिए शोक करता है और न ही मृतकों के लिए।

भ.गी. 2.12 – निश्चित ही, ऐसा कभी भी समय नहीं था जब मैं अस्तित्व में नहीं था या आप या ये सभी राजा और भविष्य में भी किसी का कभी भी अनस्तित्व नहीं होगा। [टिप्पणी: जीव यह कभी भी नहीं मरता। भौतिक शरीर ही बारंबार जन्म लेकर मरता है।]

भ.गी. 2.13 – जैसे (शरीरधारी-बद्ध) जीव वर्तमान शरीर में स्थानांतरित होता है, बचपन से जवानी तक और फिर जवानी से बुढ़ापे तक, वैसे ही वह मृत्यु के समय दूसरे शरीर में स्थानांतरित होता है। एक विद्वान ऐसे परिवर्तन से विचलित नहीं होता।

भ.गी. 2.14 – (पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाओं के कारण) सुख और दुःख का प्रकट, यह गरमी और सर्दी के मौसम के प्रकट और अप्रकट जैसा है, हे कौन्तेय। ये इन्द्रिय अनुभूति से ही अनुभव किए जाते हैं, हे भारत। तुम्हें इनसे बिना विचलित हुए इन्हें सहन करना सीखना चाहिए।

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भ.गी. 2.15 – 22 – जैसे इन्सान अपने पुराने वस्त्र को त्यागकर नया वस्त्र पहनता है, वैसे ही बद्ध जीव अपने वर्तमान शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करता है।

भ.गी. 2.23 – 36 – क्षत्रिय के रूप में अपने विशिष्ट कर्तव्य के बारे में विचार करते हुए तुम्हे यह जानना चाहिए कि, अधार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध युद्ध करने के अतरिक्त दूसरा श्रेष्ठ कोई कर्म तुम्हारे लिए नहीं है। अगर तुम युद्ध रूपी अपने नियत कर्तव्य को निभाने में विफल रहते हो, तो निश्चित ही तुम पर पाप लगेगा। लोग तुम्हारी अपकीर्ति के बारे में हमेशा बात करेंगे और एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी ज़्यादा बुरा है। तुम्हारे अभिधान और प्रसिद्धि का सम्मान करने वाले महायोद्धाओं यह सोचेंगे कि डर के कारण तुमने युद्धभूमि छोड़ दिया। इससे अधिक दुःखदायी क्या हो सकता है?

भ.गी. 2.37, 38 – या तो तुम गौरवपूर्ण मृत्यु प्राप्त करके उच्चतर गति प्राप्त करोगे या फिर तुम युद्ध में विजय प्राप्त करके राज्य प्राप्त करोगे, हे कौन्तेय। अतः सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय इसका विचार न करके पूर्ण दृढ़निश्चय के साथ खड़े हो जाओ और युद्ध करो – इस प्रकार करने पर तुम्हें कभी भी पाप नहीं लगेगा।

भ.गी. 2.39 – मैंने अब तक तुम्हें सांख्य-योग अर्थात कार्यों के विश्लेषण के आधार पर वर्णित किया है, हे पार्थ। अब से मैं कार्यों के फलों की कोई इच्छा के बिना कैसे कार्य करना चाहिए इसके बारे में वर्णन करूँगा।

भ.गी. 2.40, 41 – इस शुद्ध भक्तिमय सेवा की मार्ग पर, हे अर्जुन, कोई हानि या घटाव नहीं है और थोडा सा उन्नति भी व्यक्ति को सांसारिक-अस्तित्व के भयानक भय से बचा सकती है।

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भ.गी. 2.42 – 44 – जिनका मन इंद्रिय-उपभोग और स्वर्गिक-ऐश्वर्य में अधिक आसक्त होती है, उनके लिए शुद्ध भक्तिमय सेवा की दृढ़निश्चय प्रकट नहीं होती। [टिप्पणी: अपने नियत कर्तव्यों को किसी भी लापरवाही के बिना और किसी भी निम्न हेतु बिना (पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को केंद्र मैं रखकर) निभायेंगे जो अंत में भगवत-प्रेम की ओर ले जायेंगे यही वास्तव में शुद्ध भक्तिमय सेवा का मार्ग है। – श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के रसिकरंजन से]

भ.गी. 2.45, 46 – वेद सामान्यतः भौतिक-प्रकृति के तीन गुण के बारे में (अर्थात कार्य और उसकी प्रतिक्रियाओं के बारे में) चर्चा करते हैं, हे अर्जुन; इनसे तुम परे हो जाओ और सदैव शुद्ध भक्तिमय सेवा के स्तर पर स्थित हो जाओ। सदैव द्वंद्वों और (लाभ तथा सुरक्षा के प्रति) चिंताओं से मुक्त होकर स्वयं में स्थित हो जाओ।

भ.गी. 2.47 – हे अर्जुन, अपने नियत कर्तव्यों को निभाने के लिए तुम्हें विशेषाधिकार है, परंतु अपने श्रम के प्रतिफलों को उपभोग करने के विशेषाधिकार नहीं है (उसको अपनी आवश्यकताओं को पूर्ती करने के लिए ही उपयोग कर सकते हो लेकिन निश्चित ही इंद्रिय- उपभोग के लिए नहीं)। अपने श्रम के प्रतिफलों के प्रति कभी भी आसक्त नहीं होना क्योंकि वह भौतिक-प्रकृति के तीन गुण के द्वारा कठोर रूप से नियंत्रित किए जाते हैं (अपने पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर)। साथ ही, अपने नियत कर्तव्यों को न निभाने के प्रति भी आसक्त नहीं होना।

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भ.गी. 2.48 – 53 – अपने नियत कर्तव्यों को निष्ठापूर्वक किसी भी लापरवाही के बिना और किसी भी निम्न हेतु बिना निभाकर तुम सभी लौकिक सकाम कर्मों को दूर करो, हे धनञ्जय। जो अपने श्रम के प्रतिफलों को उपभोग करना चाहते हैं, वे कृपण हैं।

भ.गी. 2.54 – अर्जुन ने पूछा: हे केशव! जिनका मन और बुद्धि इस प्रकार स्थिर होने पर उनका व्यवहार कैसा रहता है?

भ.गी. 2.55 – पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहा: हे पार्थ, जिन्होंने (इंद्रिय-उपभोग की) अपने इच्छाओ को पूरी तरह त्याग दिया हैं और जिनका मन स्वयं में ही संतुष्ट रहता है, वे शुद्ध चेतना में स्थित कहा जाता हैं।

भ.गी. 2.56, 57 – भौतिक देह धारण करने तक बद्ध जीव निश्चित ही भौतिक-अस्तित्व के द्वंदों को अनुभव करता रहेगा (उनके पिछले कर्मों के प्रतिक्रियाओं के अनुसार), जैसे कि सुख और दुःख, अच्छा और बुरा, सफलता और विफलता, इत्यादि। जो कोई इन द्वंद्वों से प्रभावित नहीं होता, न तो उनकी प्रशंसा करता है और न ही उनसे घृणा करता है, वह परिपूर्ण ज्ञान में दृढ़तापूर्वक स्थित कहा जाता है।

भ.गी. 2.58 – 61 – जिस तरह कछुआ अपने अंगों को अपने खोल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही जो कोई अपने इंद्रियों को उसकी वस्तुवों से हटा लेता हैं, वह उत्तम-चेतना में दृढ़तापूर्वक स्थित कहे जाते हैं।

भ.गी. 2.62 – 70 – जिस प्रकार सदा-पूर्ण स्थिर-समुद्र नदियों के लगातार प्रवाह से विक्षुब्ध नहीं होता, उसी प्रकार जो कोई अपनी इच्छाओं के लगातार प्रवाह से विक्षुब्ध नहीं होता (जो अपने पिछले कर्मों की प्रतिक्रियाओं के कारण प्रकट होता है), वो ही शांति प्राप्त कर सकता है; ना कि वो, जो उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास करता है।

भ.गी. 2.71, 72 – [(इन्द्रिय-उपभोग की) अपनी सभी इच्छाओं को त्यागने के बाद] जो कोई स्वामित्व और मिथ्य-अहंकार की भावना रहित रहता है – वही वास्तविक शांति प्राप्त कर सकता है| अगर कोई इस प्रकार मृत्यु के समय में भी स्थिर हो जाता है वह परमधाम प्राप्त करता है।

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महत्वपूर्ण श्लोक:

मैं सर्वोच्च होने के कारण, हे पार्थ, मेरे लिए तीनों लोकों में कोई कर्तव्य विहित नहीं है, न तो मुझे कुछ प्राप्त करने के लिए आवश्यकता है, न ही मुझे किसी चीज़ की जरुरत है – फिर भी मैं अपने सभी नियत कर्तव्यों में द्यांपुर्वक संलग्न रहता हूँ। – भ.गी. 3.22

अर्जुन ने पूछा: हे वार्ष्णेय! वास्तव में क्या मनुष्य को पाप कार्यों के लिए प्रेरित करता है मानो उसे न चाहते हुए भी जबरदस्ती शामिल किया गया हो? – भ.गी. 3.36

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहा: हे अर्जुन, निश्चित ही, काम वासना ही इसका कारण है, जो पिछले कर्मों के प्रतिक्रियाओं के द्वारा प्राप्त किए रजोगुण से प्राप्त होती है। काम वासना यह (सबकुछ निगलने वाले) सबसे बड़ी पापी शत्रु है, जो कुछ-समय के बाद क्रोध के रूप में परिवर्तित हो जाती है। इसलिए, जीवन के प्रारंभ से ही, हे भरतरिषभ, अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके पाप के महान प्रतीक यह काम वासना को वशीभूत करो और ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार का नाश करने वाले इस पापी शत्रु का नाश करो। – भ.गी. 3.37, 41

हे अर्जुन, भले ही सभी पापियों में से तुम्हे सबसे बड़े पापी ऐसा माने जाओगे, तो भी तुम जब अध्यात्मिक-आत्मज्ञान रूपी नाव पर स्थित हो जाते हो, तब तुम सांसारिक-अस्तित्व के महासागर को पार कर पावोगे। जिस तरह प्रज्वलित-अग्नि लकड़ी को जलाकर भस्म कर देती है, उसी तरह अध्यात्मिक-आत्मज्ञान रूपी अग्नि व्यक्ति के पिछले कर्मों की सभी प्रतिक्रियाओं को भस्म कर देती है। – भ.गी. 4.36, 37

स्व त्याग कार्य (अपने व्यवसाय के रूप में), दान (अपने आश्रम के रूप में) और अध्यात्मिक-आत्मसंयम (अपनी साधना के रूप में) – कभी भी इन्हें परित्याग करना नहीं चाहिए। वास्तव में स्व त्याग कार्य, दान और अध्यात्मिक-आत्मसंयम महात्माओं को भी शुद्ध करते हैं। परंतु, इन्हें फल की कोई भी अपेक्षा के बिना एक ज़िम्मेदारी के रूप में निभाना चाहिए, हे पार्थ। यही मेरा अंतिम मत है। – भ.गी. 18.5-6 [टिप्पणी: जैसे यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान स्वयं ने बताया है (यही उनके अंतिम मत है), यही संपूर्ण भगवद्गीता का सारांश है।]

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहा: हे पार्थ, क्या तुमने मेरे उपदेशों को एकाग्र मन से सुना? क्या अब तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ, हे धनंजय? – भ.गी. 18.72

अअर्जुन ने कहा: हे अच्युत! अब मेरा मोह समाप्त हो चुका है। आपकी कृपा से मेरी स्मृति वापस मुझे मिल चुकी है। अब, मैं दृढ़तापूर्वक स्थिर हूँ और सभी संदेहों से मुक्त हूँ, और आपके आदेशानुसार कर्म निभाने के लिए मैं तत्पर हूँ। – भ.गी. 18.73

जहाँ कही योगेश्वर (कृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान) हैं और जहाँ कही धनुर्धर (अर्जुन, शुद्ध भक्त) हैं, निश्चय ही वहाँ ऐश्वर्य, विजय, असाधारण-शक्ति, दृढ़-संकल्प और नैतिकता होंगे। – भ.गी. 18.78

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निष्कर्ष: (भ.गी. 18.5-6 के अनुसार)

यद्यपि व्यक्ति के नियत कर्तव्य अनेक हो सकते हैं फिर भी उन्हें तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है।

  1. व्यवसाय संबंधित नियत कर्तव्य (वर्ण)
    • ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र। [आज का सन्दर्भ में डॉक्टर, इंजीनियर, कृषक, शिक्षक, प्रशासक, योद्धा, वकील, मज़दूर, आदि।]
  1. परिवार संबंधित नियत कर्तव्य (आश्रम)
    • अपने माता-पिता, बच्चों, सास-ससुर और इतर (जैसे कि संत-महात्मा, परस्पर-अवलम्बित जीव (अर्थात सभी जीव), आदि) संबंधित नियत कर्तव्य। [टिप्पणी: भक्तिमय सेवा यह एक अनुष्ठानिक कार्यों का समूह नहीं है; यह एक जिम्मेदारी का कार्य है। (जो शरीर तथा स्वयं इन दोनों के माध्यम से किया जाता है अर्थात शरीर नियत कर्तव्यों को निभाने में संलग्न होना चाहिए और साथ ही स्वयं भगवत-प्रेम में मग्न होना चाहिए।)]
  1. अध्यात्मिक-आत्मसंयम संबंधित नियत कर्तव्य (साधना)
    • व्यक्ति की चेतना के स्थिति के अनुसार उनका साधना का स्तर अलग-अलग होता है: विराट-रूप, सायुज्य, सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य, शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, श्रृंगार और श्रृंगार-औदार्य। [वर्तमान युग अर्थात कलयुग के लिए सब के लिए सबसे सरल और आसानी साधना है – भगवान के दिव्य नामों का सामूहिक कीर्तन वृंदावन निवासियो जैसे अगणित आसक्ति के साथ।]

जब कोई इन तीन प्रकार के नियत कर्तव्य को किसी भी लापरवाही के बिना और किसी भी निम्न हेतु बिना (पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को केंद्र मैं रखकर) निभाते है, तो वह भक्तिमय सेवा में है ऐसा माना जाता है। अन्तः जब उनकी भक्तिमय सेवा परिपक्व होकर भगवत-प्रेम में विलीन हो जाती है, तो वह शुद्ध भक्तिमय सेवा में है माना जाता है। (जिसकी परिचर्चा श्री चैतन्य चरितामृत में विस्तृत रूप में की गई है।)

श्री चैतन्य चरितामृत (मध्य लीला 128, 129) में कहा गया है,

साधु-संग, नाम-कीर्तन, भागवत-श्रवण
मथुरा-वास, श्री-मूर्तिर श्रद्धाय सेवन
सकल-साधना-श्रेष्ठ एई पंच अंग
कृष्ण-प्रेम जन्माय एई पाँचेर अल्प संग

जब इन भक्तिमय सेवा के पाँच प्रमुख अंग को कृष्ण के साथ वृंदावन निवासियों जैसे अगणित आसक्ति के साथ निम्नलिखित किसी एक संबंध में अर्थात श्रृंगार, वात्सल्य, सख्य या दास्य में निभाया जाता है, तो निश्चित ही मनुष्य शारीरिक-धारणाओं के जीवन को पार करके इसी जन्म में शुद्ध कृष्ण-प्रेम को प्राप्त कर सकता है। यही श्री चैतन्य चरितामृत का सार है। – आदि 3.11

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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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