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श्रीचैतन्य-चरितामृत

के सारांश-दर्शन

(रस-आस्वादन के रूप में)

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पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान – श्री चैतन्य महाप्रभु

आदि १.२ – श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो ! श्री नित्यानंद प्रभु की जय हो ! श्रील अद्वैत आचार्य की जय हो ! श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तगणों की जय हो !

आदि १.५ – श्रीमती राधारानी और कृष्ण की प्रेममय लीलाएँ भगवान की अंतरंग शक्ति का एक दिव्य प्रदर्शन है। यद्यपि श्रीमती राधारानी और कृष्ण एक है, वे शाश्वत काल से (बद्ध जीवों को माधुर्य-प्रेम प्रदान करने के लिए) भिन्न रूपों में प्रकट है। अभी श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में वे पुनः एक हो गये हैं। मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ। श्री चैतन्य महाप्रभु साक्षात् कृष्ण है, किंतु श्रीमति राधारानी के भाव लेकर उनकी अंगकान्ति के साथ वे प्रकट हुए हैं।हुए हैं।

[बद्ध जीवों को माधुर्य-प्रेम प्रदान करने के लिए ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण शाश्वत काल से श्रीमती राधारानी के रूप में विस्तारित हुए है (और सभी गोपियों श्रीमती राधारानी का ही विस्तार है)।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण और उनके विशुद्ध भक्तों के बीच गहरा और विशुद्ध प्रेम-आदानप्रदान यही माधुर्य-प्रेम है (इसमें केवल जीव के स्तर पर ही भाग लिया जाता है; शारीरिक स्तर पर थोडा भी भाग लिया नहीं जाता है)। इसलिए इसको सब से उच्च माना जाता है।भगवान शिव और नारद भी इसमें भाग लिये हैं।]

आदि १.११० – श्रीरूप-रघुनाथ के चरणकमलों में सदैव प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।ए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।मृत का वर्णन कर रहा हूँ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के बाह्य कारण

आदि ३.२ – श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो ! श्री नित्यानंद प्रभु की जय हो ! श्रील अद्वैत आचार्य की जय हो ! श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तगणों की जय हो !

आदि ३.५, ६, ११ – यदि कोई गोलोक-वृन्दावन निवासियों जैसे कृष्ण के साथ निम्नलिखित चार प्रिय संबन्धों का सदैव आस्वादन करते रहेंगे, तो कृष्ण शीघ्र ही उनके वश में हो जाते हैं।

  1. कृष्ण के साथ एक प्रिय सेवक के भाव में संबन्ध – दास्य-रस
  2. कृष्ण के साथ एक प्रिय मित्र के भाव में संबन्ध – सख्य-रस
  3. कृष्ण के साथ प्रिय माता-पिता के भाव में संबन्ध – वात्सल्य-रस
  4. कृष्ण के साथ प्रिय प्रेमीका के भाव में संबन्ध – माधुर्य-रस (सावधान: यह जीव के स्तर पर प्रेमीका है; शरीर के नहीं।)

गोलोक-वृन्दावन के निवासी इन चार प्रिय संबन्धों में सदैव मग्न होकर शाश्वत आनंद का आस्वादन करते रहते है। ब्रह्मा के एक दिन में अर्थात ८६४ करोड़ वर्ष में एक ही बार कृष्ण गोलोक-वृन्दावन निवासियों के साथ इस भौतिक जगत में अवतरित होकर इन चार प्रिय संबन्धों को अद्भुत लीलाओं के माध्यम से सभी जीवों का कल्याण के लिए प्रकट करते हैं।

आदि ३.१२ – इस प्रकार कृष्ण केवल ५००० वर्ष पूर्व ही अवतरित होकर इन चार प्रिय संबन्धों को प्रकट किये और वापस उनके धाम गोलोक वृन्दावन चले गए।

आदि ३.१३ – इसके बाद कृष्ण हाल ही में लगबग सन् १४०० में पुनः इस पृथ्वी पर अवतरित होने का निर्णय लिए और ५००० वर्ष पूर्व प्रकट किये हुए उन चार प्रिय संबन्धों को गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन के माध्यम से संपूर्ण विश्व को वितरण करने के लिए विचार किये।

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आदि ३.१४ – इस तरह उन्होंने विचार किया कि, “मैंने दीर्घ काल से इस भौतिक जगत के निवासियों को मेरी प्रेममयी भक्ति अर्थात उन चार प्रिय संबन्धों का वितरण नहीं किया था। मेरी प्रेममयी भक्ति के बिना इस भौतिक जगत का अस्तित्व व्यर्थ है”।

आदि ३.१५ – “भौतिक जगत के निवासी शास्त्रों के विधी-विधानों के अनुसार वैधि भक्ति करते हैं। किंतु ऐसी वैधि भक्ति करने मात्र से गोलोक-वृन्दावन निवासियों के समान प्रेम-भाव को प्राप्त नहीं किया जा सकता”।

आदि ३.१६ – “भौतिक जगत के निवासी मेरे ऐश्वर्य को जानते हुए आदर एवं सम्मान की भावना में वैधि भक्ति करते हैं। किंतु ऐसी आदर एवं सम्मान से शिथिल हुई वैधि भक्ति मुझे आकर्षित नहीं करती”।

The purport of Srila Prabhupada for this verse is as follows: One cannot understand the dealings of the Supreme Lord in Vrindavan by simply executing the regulative principles mentioned in the scriptures; by this one may enhance his appreciation for the glories of the Supreme Lord but the chance of one’s entering into personal loving reciprocation with Him reduces. To teach these principles of loving reciprocation, the Lord Himself decided to appear in the form of Sri Caitanya Mahaprabhu in the holy island of Navadwip.

आदि ३.१७ – “मनुष्य वैधि भक्ति करने पर चार प्रकार की मुक्ति प्राप्त कर सकते है और वैकुण्ठ जा सकते है। किंतु मेरी अनन्य प्रेममयी भक्ति करने पर मेरे गोलोक-वृन्दावन को प्राप्त कर सकते हैं”। प्राप्त कर सकते हैं”।

आदि ३.१९ – “अतः इस भौतिक जगत में मैं पुनः अवतरित होकर गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन को प्रतिष्ठापन करूँगा और उसके माध्यम से उन चार प्रिय सम्बंधों का अनुभूति करवाकर संपूर्ण विश्व को नृत्य करने के लिए प्रवृत्त करूँगा”।

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आदि ३.२० – “मैं मेरे भक्त की भूमिका स्वीकार करूँगा और मेरे प्रेममय भक्ति का स्वयं आचरण करूँगा। इस तरह मैं संपूर्ण विश्व को मेरे प्रेममय भक्ति का वितरण करुँगा”।

आदि ३.२९ – इस प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण सन् १४८६ में गौड़देश के क्षितिज पर श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए।में गौड़देश के क्षितिज पर श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए।

आदि ३.११४ – श्रीरूप-रघुनाथ के चरणकमलों में सदैव प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

[प्रत्येक कलि-युग में युगधर्मं हरीनाम संकीर्तन को स्थापित करने के लिए भगवान श्री विष्णु (गौर-नारायण के रूप में) अवतरित होते है। किंतु इस कलि-युग में ८६४ करोड़ वर्ष के बाद गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन को भी प्रदान करने का समय आ गया था। इसलिए, इस कलि-युग में कृष्ण स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित होकर अंतरंग रूप से गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन को आस्वादन करते हुए बहिरंग रूप से युगधर्मं हरीनाम संकीर्तन को भी प्रदान किये – आदि ३.२६-२९, ४.९, ४.१५-१६, ४.१८, ४.२१-२२

कृष्ण के चार प्रेममय संबन्धों के प्रति आकर्षित होकर गाया गया हरीनाम संकीर्तन गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन है। परंतु, कृष्ण के ऐश्वर्य के प्रति आकर्षित होकर गाया गया हरीनाम संकीर्तन युगधर्मं हरीनाम संकीर्तन है।

श्रीचैतन्य-चरितामृत में दिये गए कृष्ण-प्रेम को समझने के लिए सर्व प्रथम भगवद्गीता में दिये गए प्रमाणिक व्यवहार को समझना अत्यन्त आवश्यक है। कृपया www.booksofsrilaprabhupada.com वेबसाइट से “भगवद्गीता के द्वारा जानने योग्य गहरा सार (सार्थक जीवन के लिए)” पुस्तिका देखें।]

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य के गुह्य कारण

आदि ४.२ – श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो ! श्री नित्यानंद प्रभु की जय हो ! श्रील अद्वैत आचार्य की जय हो ! श्री गौरांग महाप्रभु के समस्त भक्तगणों की जय हो !

आदि ४.५, ६ – गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम-संकीर्तन के माध्यम से संपूर्ण विश्व को अपनी प्रेममयी भक्ति प्रदान करने के लिए ही इस पृथ्वी पर श्री चैतन्य महाप्रभु अवतरित हुए हैं (और साथ ही बहिरंग रूप से युगधर्मं हरीनाम संकीर्तन को भी प्रदान किये)। यद्यपि यह सत्य है, फिर भी यह श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार का बाह्य कारण है। उनके अवतार का अन्य गुह्य कारण भी है, कृपया ध्यान से सुनें।

आदि ४.१०४ – यह गुह्य कारण तीन प्रकार के है जिसको स्वरुप दामोदर गोस्वामी ने प्रकट किया है (जो श्री चैतन्य महाप्रभु के निकटतम पार्षद हैं)।

आदि ४.१२६, १३६, १३७ – “मेरे प्रति श्रीमती राधारानी के अगाध-प्रेम के कारण वे मुझसे भी करोड़ों गुना अधिक आनंद का आस्वादन करती रहती हैं”। इस तरह विचार करते हुए जिस कृष्ण-प्रेम को श्रीमती राधारानी और गोपियों सदैव आस्वादन करती रहती हैं, उस कृष्ण प्रेम को स्वयं आस्वादन करने के लिए कृष्ण तीव्र उत्सुक थे और उनकी यह इच्छा अग्नि के समान प्रज्ज्वलित होने लगी। यही (संक्षिप्त रूप में) उनकी प्रथम इच्छा है। कृपया अभी दूसरी इच्छा के बारे में सुनें।

आदि ४.१३८, १३९ – खुद की माधुर्य से आकर्षित होकर कृष्ण इस प्रकार विचार करने लगे, “मेरा माधुर्य अद्भुत, अनंत और पूर्ण है। तीनों लोकों में कोई इसकी सीमा नहीं पा सकता। परंतु, श्रीमती राधारानी संपूर्ण रूप से इस अनंत माधुर्य का आस्वादन करती रहती हैं।

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आदि ४.१५५ – गोपियों ने कहा, “हे सखियों! जो आँखें श्री नंद महाराज के पुत्रों के सुंदर-मुखों का दर्शन करती हैं, निश्चय ही वे भाग्यशाली हैं। कृष्ण और बलराम जब अपने सखाओं के साथ गायों को लेकर वन में प्रवेश करते हैं, तब वे दोनों अपने बंसियों को होंठों पर रखते हुए वृन्दावन निवासियों की ओर प्रेमपूर्वक दृष्टिपात करते हैं। हमारी विचार से जिनके पास आखें है, उनके लिए इससे बढ़कर अन्य दर्शनीय वस्तु और कुछ नहीं है”।

[अन्त्य लीला में इस श्लोक जैसे ही एक सुन्दर श्लोक की वर्णन इस प्रकार है: विशाखा से श्रीमती राधारानी ने कहा, “हे सखी! कृपया मुझे बताओं, मैं क्या करूँ? कृष्ण एक अद्भुत बादल जैसा आकर्षक हैं और मेरी आँखें एक चातक पक्षी जैसी हैं जो प्यास से मर रही हैं क्योंकि वे ऐसे बादल को नहीं देख पा रहीं”।]

आदि ४.१५६ – मथुरा की स्त्रियों ने कहा, “न जाने गोपियों ने कौन सा तप किया हैं वे अपनी आँखें से निरंतर कृष्ण के स्वरूप को पान करती रहती हैं, जो लावण्य का सार है और जिसके बराबर या बढ़कर और कुछ नहीं है। कृष्ण के यह लावण्य संपूर्ण और नित्य नवीन है यही लावण्य सर्वैश्वर्य और यश का एकमेव निवास-स्थान है”।

आदि ४.१४४, १४५, १५८, १५९ – कृष्ण की मधुरता का शक्ति इतनी है कि वह स्वयं उन्हें भी आकर्षित करती है। जब वे इस मधुरता को आस्वादन करने के लिए उपाय सोचते हैं, तब वे श्रीमती राधारानी के स्थान के लिए लालायित हो जाते हैं। यही (संक्षिप्त रूप में) उनकी द्वितीय इच्छा है। कृपया अभी तीसरी इच्छा के बारे में सुनें।

आदि ४.१६२ से १६५ – कृष्ण के प्रति गोपियों के प्रेममय संबन्ध – विशुद्ध, निष्कलंक और दोषरहित है। जिस तरह लोहे और सोने के लक्षण अलग-अलग होते हैं, उसी तरह काम और प्रेम के लक्षण अलग-अलग होते हैं। अपनी खुद की इन्द्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा काम है किंतु हमारी प्रत्येक व्यवहार के माध्यम से कृष्ण को संतुष्ट करने की इच्छा प्रेम है। [काम – यह इन्द्रियों का व्यवहार है, परंतु प्रेम – यह जीव का व्यवहार है। दूसरे शब्दों में समझना है तो इन्द्रिय-वस्तुओं के प्रति आकर्षित होना काम है किंतु कृष्ण के प्रति आकर्षित होना प्रेम है।]

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आदि ४.१७७ से १८० – “मैं निश्चित ही मेरे भक्तगणों की प्रेममय अहैतुकी सेवाओं के अनुसार उनके साथ आदान-प्रदान करुँगा”। कृष्ण की यह प्रतिज्ञा गोपियों की प्रेममय अहैतुकी सेवा से भंग हो चुकी है। इसको कृष्ण स्वयं स्वीकार किये, “हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा संबन्ध विशुद्ध, निष्कलंक और दोषरहित है। तुम सभी ने मेरी अहैतुकी प्रेममय सेवा के लिए सारे पारिवारिक बंधनों को तोड़ दिया। ब्रह्मा के काल में भी मैं तुम्हारी यह अहैतुकी सेवा का कर्ज चुका नहीं सकता”।

आदि ४.२१४ से २२५ – सभी गोपियों में श्रीमती राधारानी सर्वश्रेष्ठ हैं, वे सदगुण, सौंदर्य, सौभाग्य और कृष्ण-प्रेम में सर्वश्रेष्ठ हैं। सारांशतः जिस कृष्ण-प्रेम को श्रीमती राधारानी और गोपियों सदैव आस्वादन करती रहती हैं, उस कृष्ण-प्रेम को स्वयं आस्वादन करने के लिए ही कृष्ण इस पृथ्वी पर श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए और यही उनके अवतार का मुख्य और गुह्य कारण है।

आदि ४.२७७ – श्रीरूप-रघुनाथ के चरणकमलों में सदैव प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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मध्य लीला – अध्याय ३

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ सभी भक्तगणों की श्रील अद्वैत आचार्य के घर पर भावपूर्ण भेंट

मध्य ३.१ – श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास ग्रहण करने के बाद उत्कट कृष्ण-प्रेमवश वृन्दावन जाना चाहते थे। भाव-आवेश में वे खो जाने के कारण लगातार तीन दिनों तक राढ़देश में घूमते रहे। श्री नित्यानंद प्रभु उन्हें किसी प्रकार से शांतिपूर ले आये और सभी भक्तगणों के साथ मिलवाया। मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हुँ।

मध्य ३.२ – श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो ! श्री नित्यानंद प्रभु की जय हो! श्रील अद्वैत आचार्य की जय हो ! श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तगणों की जय हो!

मध्य ३.३, ४ – चौबिस्वे वर्ष की आयु के अंत में माघ महिना के शुक्लपक्ष में श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास ग्रहण किये। संन्यास ग्रहण करने के बाद, वे वृन्दावन जाकर एकांत में कृष्ण की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने का निश्चय किये।

मध्य ३.५, ६ – उस समय उन्होंने भाव-आवेश में एक महत्वपूर्ण श्लोक सुनाया, “मैं कृष्ण की प्रेममय सेवा में दृड़तापुर्वक स्थिर होने पर इस अज्ञानमय भवसागर को पार कर पाउँगा। इसे पूर्व के आचार्यों ने प्रमाणित किया है”।

मध्य ३.१० – जब इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु भाव-आवेश में वृन्दावन की ओर जा रहे थे, तब उन्हें ये भी समझ में नहीं आ रहा था कि, वे किस दिशा में जा रहे हैं और यह दिन है अथवा रात है। उस समय महाप्रभु के साथ श्री नित्यानंद प्रभु, श्रील चन्द्रशेखर आचार्य और मुकुंद थे।

मध्य ३.११ – श्री चैतन्य महाप्रभु के इस भाव-आवेश को जिन्होंने भी देखा, वे तुरन्त ही उच्च स्वर में “हरि! हरि!” बोलने लगे।

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मध्य ३.१३ – श्री चैतन्य महाप्रभु के इस भाव-आवेश को देखकर सभी ग्वालबाल उनके साथ चलने लगे और उच्च स्वर में “हरि! हरि!” बोलने लगे।

मध्य ३.१४ – महाप्रभु उन सभी ग्वालबालकों के सिर पर हाथ रखकर इस तरह आशीर्वाद दिया, “इसी तरह तुम लोग सदैव श्रीकृष्ण नाम का कीर्तन करते रहना”।

मध्य ३.१६, १७ – उन सभी ग्वालबालकों को एकांत में बुलाकर श्री नित्यानंद प्रभु ने इस प्रकार सूचना दि, “यदि श्री चैतन्य महाप्रभु तुम लोगों से वृन्दावन जाने का रास्ता पूछेंगे, तो गंगा नदी का रास्ता दिखा देना”।

मध्य ३.१८, १९ – उन ग्वालबालकों ने उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु को गंगा नदी का रास्ता दिखा दिया। न जानकर श्री चैतन्य महाप्रभु उसी रास्ते पर चल पड़े।

मध्य ३.२० – श्री नित्यानंद प्रभु ने तुरन्त ही श्रील चन्द्र्शेखर आचार्य को श्रील अद्वैत आचार्य के घर पर जाने के लिए कहा।

मध्य ३.२१ – उन्होंने कहा, “किसी प्रकार से मैं श्री चैतन्य महाप्रभु को शांतिपूर के गंगा के तट पर ले आऊँगा। तुरन्त ही आप श्रील अद्वैत आचार्य के घर पर जाकर, उन्हें तत्काल एक नाव लेकर वहाँ पर पहुँचने के लिए कहें”।

मध्य ३.२२ – उसके बाद, आप तुरन्त ही नवद्वीप जाकर श्रीमती शचीमाता और सभी भक्तगणों को श्रील अद्वैत आचार्य के घर पर ले आयें”।

मध्य ३.२५ – उत्सुकतावश श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री नित्यानंद प्रभु से पूछा, “वृन्दावन यहाँ से और कितना दूर है”। श्री नित्यानंद प्रभु ने कहा, “देखिये! यमुना दिख रही है!”

मध्य ३.२६ – श्री नित्यानंद प्रभु इस तरह कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु को गंगा नदी के पास ले गये।

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मध्य ३.२७ – भाव-आवेश में श्री चैतन्य महाप्रभु गंगा को ही यमुना मानकर उसकी स्तुति करने लगे, “ओह! मेरा कितना सौभाग्य है, आज मुझे यमुना का दर्शन मिल रहा है”।

मध्य ३.२८ – “हे यमुना ! आप महाराज श्री नंद के पुत्र को प्रेम प्रदान करने वाली वह दिव्य आनंदमयी नदी हो! आप आध्यात्मिक जगत से प्रकट हुई हो और संपूर्ण विश्व को सर्व-मंगल प्रदान करने वाली हो! हे सूर्यदेव की पुत्री ! कृपया हमें शुद्ध कर दें!”।

मध्य ३.२९, ३० – इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु स्तुति करते हुए गंगा को प्रणाम किये और उसमे स्नान किये। स्नान होने के बाद महाप्रभु के पास बदलने के लिए दूसरा कोई वस्त्र नहीं था। उसी समय श्रील अद्वैत आचार्य नए वस्त्र के साथ नाव से वहाँ पर पहुँचे।

मध्य ३.३१, ३२ – श्रील अद्वैत आचार्य भावित होकर श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार किये। श्री चैतन्य महाप्रभु ने आश्चर्यचकित होकर पूच्छा, “आपको कैसे पता चला मैं वृन्दावन में हूँ?”

मध्य ३.३३ – श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, “आप जहाँ भी हैं, वही वृन्दावन है। यह हमारा सौभाग्य है कि आप शांतिपुर के गंगा के तट पर आये हुए हैं”।

मध्य ३.३४ – श्री चैतन्य महाप्रभु यह सुनकर अत्याधिक विलाप करने लगे, “नित्यानंद ने मुझे धोखा दिया है”।

मध्य ३.३५ – श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, “श्री नित्यानंद प्रभु ने जो भी आप से कहा वह सच ही है। आपने अभी यमुना में ही स्नान किया”।

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मध्य ३.३६ – “इस स्थान पर गंगा और यमुना दोनों ही साथ-साथ बहती है। इस तरफ अर्थात पश्चिम दिशा में यमुना बहती है और उस तरफ अर्थात पूर्व दिशा में गंगा बहती है”।

मध्य ३.३८, ३९ – इसके बाद श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, “आप लगातार तीन दिनों से उत्कट-कृष्ण-प्रेमवश उपवास कर रहे हैं, कृपया भिक्षा ग्रहण करने के लिए आप मेरे साथ मेरे घर चलें। हमारे घर पर थोडा सा चावल पकाया है और तरकारियाँ भी अत्यंत साधारण है”।

मध्य ३.४० – इस प्रकार कहकर महाप्रभु को नाव में बैठाकर श्रील अद्वैत आचार्य अपने घर ले आये और बड़े ही आनंद से उनके चरण धोये।

मध्य ३.४१ – श्रील अद्वैत आचार्य की पत्नी श्रीमती सीता ठकुरानी असंख्य व्यंजनों के अति स्वादिष्ट भोजन बनाये।

मध्य ३.५७, ५८ – श्रीकृष्ण को वे सारे भोजन अर्पित किए गए और भोग-आरती की गई। इसके बाद श्रीकृष्ण को शयन कराया गया।

मध्य ३.६४ – श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु को भोजन कराने के लिए श्रील अद्वैत आचार्य उन्हें एक कमरे में ले गये।

मध्य ३.६८ – तब श्रील अद्वैत आचार्य से श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “मुझे केवल थोडा से चावल और तरकारी दें”।

मध्य ३.६९ – किंतु श्रील अद्वैत आचार्य अनेकानेक व्यंजनों से परोसे हुए केले पत्तों के समक्ष उन दोनों प्रभुओं को बलपूर्वक बिठाया।

मध्य ३.७० – श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “एक संन्यासी इतने प्रकार की व्यंजन स्वीकारना उचित नहीं है”।

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मध्य ३.७५, ७६ – श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, “जगन्नाथजी के रूप में जगन्नाथ पुरी में आप चौवन बार खाते हैं और हजारों-हजारों व्यंजन ग्रहण कारते हैं, उसकी तुलना में ये तो पाँच ग्रास भी नहीं है”।

मध्य ३.८९ – इस तरह कहते हुए श्रील अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु को बड़े ही आनंद से भोजन कराया। जैसे ही वे दोनों आधा व्यंजन समाप्त करते थे, तुरन्त ही श्रील अद्वैत आचार्य उसको फिर से भर देते थे।

मध्य ३.१०२ – भोजन समाप्त होने पर श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु के हाथ-मुँह धुलवाकर श्रील अद्वैत आचार्य उन्हें विश्राम कराने के लिए एक उत्तम बिस्तर पर ले गये।

मध्य ३.१०५, १०६ – जैसे ही बिस्तर पर श्री चैतन्य महाप्रभु लेटे, तुरन्त ही श्रील अद्वैत आचार्य उनके पाँव दबाने की सेवा के इच्छा की परंतु, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें रोक दिया और इस प्रकार कहा, “आपने अभी तक मुझे अनेक प्रकार से नचाया, अभी से ऐसा मत कीजिये जाईये मुकुंद और श्रील हरिदास ठाकुर के साथ भोजन कीजिये”।

मध्य ३.१०७ – इसके बाद मुकुंद और श्रील हरिदास ठाकुर के साथ श्रील अद्वैत आचार्य भोजन किये।

मध्य ३.१०८ – जब शांतिपुर के निवासियों ने सुना कि वहाँ पर श्री चैतन्य महाप्रभु आये हुए हैं, तब तुरन्त ही वे सब श्री चैतन्य महाप्रभु की दर्शन के लिए वहाँ पर आयें।

मध्य ३.१०९, १११ – बड़े ही आनंद से अनेकानेक लोग वहाँ पर आ रहे थे और जा रहे थे। इसकी कोई गिनती नहीं थी कि सूर्यास्तपर्यंत, वहाँ पर कितने लोग आये। श्री चैतन्य महाप्रभु के अती सुन्दर रूप को देखकर वे सब अत्यन्त प्रसन्न हो गये।

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मध्य ३.११२, ११३ – श्रील अद्वैत आचार्य ने संध्याकाल होते ही सामूहिक कीर्तन प्रारम्भ किया और वे बड़े ही आनंद से नाचने लगे। श्री नित्यानंद प्रभु उनके पीछे-पीछे नाचने लगे और श्रील हरिदास ठाकुर भी नाचने लगे।

मध्य ३.११६, ११७ – श्रील अद्वैत आचार्य चकराकर घूमते-घूमते श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को पकड़ लिये और इस तरह कहने लगे, “बहुत दिनों से आप हमसे छुपे रहे। अभी आप कैसे तो हमारे घर पर आये हुए हैं, आपको हम यहाँ पर ही बाँधकर रखेंगे”।

मध्य ३.११९, १२१ – जब इस तरह श्रील अद्वैत आचार्य और सभी भक्तगण भाव-आवेश में नाच रहे थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु की कृष्ण प्रेम की लहरें और कृष्ण की विरह की ज्वाला अति तीव्र हो उठीं। श्री चैतन्य महाप्रभु की यह भाव-आवेश को देखकर मुकुंद ने तुरन्त ही श्रीमती राधारानी के द्वारा गाये गये अनेक पद गाने लगे, जो महाप्रभु के भाव-आवेश को पुष्ट कर रहे थे।

मध्य ३.१२४, १२५ – श्रीमती राधारानी ने विशाखा से कहा, “हे सखी! मेरी साथ क्या क्या नहीं हुआ ! कृष्ण-प्रेम के जहरीला परिणाम से मेरा मन दिन-रात जल रहा है और मुझे तनिक भी आराम नहीं मिल रहा है। कृपया आप बताओ! कृष्ण से मैं कैसे मिल सकुँगी? कोई ऐसा स्थान है, मैं तुरन्त ही वहाँ चली जाऊँगी”।

मध्य ३.१२६ – जैसे ही इस पद को मुकुंद ने गाया, श्री चैतन्य महाप्रभु के ह्रदय भाव-उन्माद से विदीर्ण हो गया।

मध्य ३.१२७ से १२९ – निराशा, खिन्नता, हर्ष-शोक, दीनता इत्यादि भावलक्षणों के प्राकट्य से श्री चैतन्य महाप्रभु का शरीर लड़खड़ाने लगा। श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय में इन सारे भावलक्षण सैनिकों की तरह लड़ने लगे। श्री चैतन्य महाप्रभु अचानक मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। यह देखकर सभी भक्तगण अत्यंत व्याकुल हो उठें।

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मध्य ३.१३० से १३२ – श्री चैतन्य महाप्रभु बहुत समय के बाद होश में आये और जैसे ही मुकुंद को वे देखे जोर जोर से बोलने लगे “और बोलो! और बोलो! बोलते रहो!”। इस तरह कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु फिर से कम से कम तीन घंटे तक नृत्य करते रहें। (महाप्रभु की) इन भावमय तरंगों को कौन समझ पायेगा?

मध्य ३.१३७ – अगला दिन सुबह, आचार्यरत्न (श्रील चंद्रशेखर आचार्य) अनेकानेक भक्तगणों के साथ श्रीमती शचीमाता को एक पालकी में बैठाकर श्रील अद्वैत आचार्य के घर पर ले आये।

मध्य ३.१४० – जैसे ही श्रीमती शचीमाता को श्री चैतन्य महाप्रभु देखे, एक दण्ड की तरह उनके चरणकमलों में गिर पड़े। श्रीमती शचीमाता मातृस्नेहवश श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने गोद में लेकर रोने लगी।

मध्य ३.१४१ – उन दोनों एक-दूसरे को देखकर अत्यन्त व्याकुल हो उठे। महाप्रभु के केशविहीन रूप को देखकर श्रीमती शचीमाता अत्यंत व्याकुल हो उठीं।

मध्य ३.१४२ – श्रीमती शचीमाता कभी महाप्रभु का मुख चूमती और कभी उन्हें ध्यानपूर्वक देखने का प्रयत्न करती, किंतु वे अश्रुपुरित नेत्र होने के कारण देख नहीं पाती।

मध्य ३.१४३, १४४ – रोते हुए श्रीमती शचीमाता ने कहा, “मेरे दुलारे निमाय! तुम भी विश्वरूप की तरह कठोर हृदयी मत बनों। वह संन्यास ग्रहण करने के बाद कभी भी मुझे देखने नहीं आया। यदि तुम भी ऐसा करोगे, तो अवश्य ही मेरी मृत्यु होगी”।

मध्य ३.१४५ से १४८ – श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “मेरी प्रिय माता! कृपया मेरी बात सुनिये! यह (मेरा) शरीर आपका ही है। इसका पालन पोषण आपने ही किया है। मैं इस कर्ज को करोड़ों जन्म में भी चुका नहीं सकता। जाने या अनजाने में मैंने संन्यास ग्रहण किया है। किंतु मैं कभी भी आप से अलग नहीं होऊंगा। जो भी आप मुझे आज्ञा देंगी, मैं उसका पालन करूँगा”।

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मध्य ३.१४९ – इस तरह कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी माता को बारम्बार प्रणाम करने लगे। श्रीमती शचीमाता फिर से महाप्रभु को अपने गोद में लेकर रोने लगी।

मध्य ३.१५० – उसके बाद, श्रील अद्वैत आचार्य ने श्रीमती शचीमाता को सांत्वना दी और घर के अन्दर ले गये।

मध्य ३.१५१ से १५५ – इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु एक एक करके सभी भक्तगणों के साथ मिले और प्रेमपूर्वक उन सब को आलिंगन किये। जिसमे श्रीवास ठाकुर, गदाधर पंडित, रामाइ, विद्यानिधि, गंगादास पंडित, वक्रेश्वर पंडित, मुरारी गुप्ता, शुक्लांबर ब्रह्मचारी, बुद्धिमंत खान, श्रीधर कोल्वेचा, वासुदेव दत्त, नंदन आचार्य, दामोदर पंडित इत्यादि भक्तगण थे।

मध्य ३.१५८ – श्रील अद्वैत आचार्य ने नवद्विप तथा अन्य गावों से आये हुए प्रत्येक भक्त को रहने की व्यवस्था और सभी प्रकार की खाद्य सामग्री प्रदान की।

मध्य ३.१६८ – श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन कराने के लिए सभी भक्तगण उन्हें अपने घर आमंत्रित करना चाहते थे।

मध्य ३.१६९, १७० – यह सुनकर चिन्तित होकर श्रीमती शचीमाता सभी भक्तगणों से इस तरह विनती करने लगी, “आप सब कभी भी निमाय से मिल सकते हैं। किंतु मेरी उससे फिर से मिलने की क्या सम्भावना है? एक संन्यासी कभी भी अपने घर नहीं आता और मुझे तो घर पर ही रहना होगा”।

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मध्य ३.१७१ – इस प्रकार कहकर श्रीमती शचीमाता सभी भक्तगणों से एक दान माँगा, “निमाय जितने भी दिन यहाँ पर रहेगा उसके लिए मैं ही भोजन बनाऊँगी”।

मध्य ३.१७२ – श्रीमती शचीमाता की यह विनती सुनकर सभी भक्तगण उन्हें अश्रुपुर्वक प्रणाम करने लगे और इस प्रकार कहने लगे, “ओह हमारी प्रिय माता! हम सब आपकी इस इच्छा को पूर्णतया मानते हैं”।

मध्य ३.१७३ – श्रीमती शचीमाता के इस तीव्र मनोभाव के बारे में सुनकर, श्री चैतन्य महाप्रभु का हृदय द्रवित हो उठा।

मध्य ३.१७४ से १७६ – इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी भक्तगणों से कहा, “मेरे प्रिय मित्रों! आप लोगों की आज्ञा के बिना मैं वृन्दावन जाना चाहता था, किंतु मुझे कैसे तो यहाँ पर ही आना पड़ा। मैं आप लोगों को एक वचन देता हूँ, “जब तक मैं जीवित रहूँगा, तब तक मैं आप लोगों को और मेरी माता को कभी नहीं त्यागूँगा”।

मध्य ३.१७७, १७८ – “परंतु, वास्तविक में एक संन्यासी अपने जन्मस्थान में रहकर अपने कुटुम्बियों से घिरा रहना उचित नहीं है। अतः आप सब मिलकर ऐसा एक इलाज खोजिये कि मुझपर कुटुम्बियों के साथ रहने का आरोप न लगें और साथ ही मैं आप लोगों से कभी भी अलग न होऊ”।

मध्य ३.१७९ – श्री चैतन्य महाप्रभु की यह इच्छा के बारे में सुनकर श्रील अद्वैत आचार्य और सभी भक्तगणों ने श्रीमती शचीमाता के पास जाकर कहा।

मध्य ३.१८०, १८१ – श्रीमती शचीमाता यह सुनकर अत्याधिक प्रसन्न हो गये और इस प्रकार कहने लगे, “यदि निमाय हमारे साथ ही रहेगा, तो मेरे लिए यह सब से बड़ा आनंद होगा। किंतु निमाय हमारे साथ रहने के कारण कोई उसकी निंदा करेगा, तो मेरे लिए यह सब से बड़ा दुःख होगा”।

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मध्य ३.१८२ – “इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि यदि निमाय जगन्नाथ पुरी में रहेगा, तो हमसे वह ज्यादा दूर पर भी नहीं रहेगा और एक संन्यासी के रूप में अलग भी रह सकेगा”।

मध्य ३.१८३ – “जगन्नाथ पुरी और नवद्विप यह दोनों एक ही घर के दो कमरे जैसे हैं। हमेशा जगन्नाथ पुरी से लोग नवद्विप आते रहते हैं और नवद्विप से भी लोग जगन्नाथ पुरी जाते रहते हैं। इस तरह हमें हमेशा निमाय के बारे में सन्देश मिलते रहेंगे”।

मध्य ३.१८७ से १८९ – श्रीमती शचीमाता की यह निर्णय के बारे में सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्याधिक प्रसन्न हो गये। इसके बाद सभी भक्तगणों से श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “मेरे प्रिय मित्रों! आप लोगों से मैं एक दान माँगता हूँ, कृपया दें”।

मध्य ३.१९० – “कृपया आप सभी अपने-अपने गाव वापस जाएँ। श्रीकृष्ण नाम का सदैव समूहिक कीर्तन करें, उनकी सेवा प्रेमपूर्वक करें और सदैव उनकी लीलाओं के बारे में चर्चा करें”। श्री चैतन्य महाप्रभु की यह आज्ञा सुनकर सभी भक्तगण अत्याधिक प्रसन्न हो गये।

मध्य ३.१९१ – उसके बाद, महाप्रभु ने सभी भक्तगणों से जगन्नाथ पुरी जाने के लिए अनुमति माँगी।

मध्य ३.२११, २१२ – सभी व्यवस्थायें तैयार होने पर श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी माता की प्रदक्षिणा किए और तेज़ी से वहाँ से निकल पड़े यह देखकर सभी भक्तगण जोर-जोर से रोने लगे, किंतु श्री चैतन्य महाप्रभु बिलकुल अप्रभावित थे।

मध्य ३.२१३, २१४ – श्रील अद्वैत आचार्य रोते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु के पीछे-पीछे चलने लगे। हाथ जोड़कर श्रील अद्वैत आचार्य से श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “आप कृपया मेरी माता और सभी भक्तगणों को सांत्वना दीजिये। यदि आप खुद ऐसे विचलित हो जायेंगे, तो कोई जीवित नहीं रह पायेगा”।

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मध्य ३.२१५ – श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह कहते हुए श्रील अद्वैत आचार्य को प्रेमपूर्वक आलिंगन किए और साथ चलने के लिए मना किये।

मध्य ३.२१६ – इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु गंगा के किनारे-किनारे जगन्नाथ पुरी की ओर चलने लगे। उस समय उनके साथ श्री नित्यानंद प्रभु, जगदानंद पंडित, दामोदर पंडित और मुकुंद थे।

मध्य ३.२१९ – श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में सदैव प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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अन्त्य लीला – अध्याय १५

श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य-उन्माद्पन

अन्त्य १५.१ – भावमय कृष्ण-प्रेम के सागर को समझ पाना ब्रम्हा जैसे देवताओं के लिए भी अत्यंत कठिन है। अपनी दिव्य लीलाओं को प्रदर्शित करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु अपने आपको उस भावमय सागर में डुबा दिये और उनका ह्रदय पूर्ण रूप से उस प्रेम में निमग्न हो गया। इस तरह उन्होंने कृष्ण-प्रेम के अति-उच्च स्तर को विविध प्रकार से प्रदर्शित किया।

अन्त्य १५.२,३ – श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो ! श्री नित्यानंद प्रभु की जय हो ! श्री अद्वैत आचार्य की जय ह ! श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तगणों की जय हो !

अन्त्य १५.४ – दिन-रात कृष्ण-प्रेम के भावमय-सागर में निमग्न होक्कर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने आपको भूले रहते थे।

अन्त्य १५.७ – एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ-मंदिर में जगन्नाथजी की ओर देख रहे थे, तब उन्हें जगन्नाथजी साक्षात् महाराज नंद के पुत्र कृष्ण जैसे दिखाई पड़े।

अन्त्य १५.८, ९ – श्री चैतन्य महाप्रभु को जब जगन्नाथजी में स्वयं कृष्ण की अनुभूति हुई, तब उनकी पाँचों इन्द्रियाँ कृष्ण के पाँचों दिव्य लक्षणों के आकर्षण में निमग्न होकर उनके अकेले मन को वे सब अलग-अलग दिशाओं में खींच रही थी, जैसे रस्साकसी में खींचा जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

अन्त्य १५.१० – महाप्रभु के साथ जो भक्तगण जगन्नाथ-मन्दिर गये थे, वे उन्हें वापस घर ले आये।

अन्त्य १५.११ – उसी-दिन, रात में स्वरुप दामोदर गोस्वामी और रामानंद राय के कंधों पर हाथ रखकर श्री चैतन्य महाप्रभु इस प्रकार विलाप करने लगे।

अन्त्य १५.१२ – कृष्ण के अत्यन्त विरह में श्रीमती राधारानी का मन जब उत्कंठित हो गया था, तब उन्होंने विशाखा से उनकी उत्कंठा का कारण को व्यक्त करने वाला एक श्लोक सुनाया था।

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अन्त्य १५.१३ – श्री चैतन्य महाप्रभु उसी श्लोक को सुनाते हुए उनकी प्रज्ज्वलित मनोभाव को स्वरुप दामोदर गोस्वामी और रामानंद राय को अभिव्यक्त किये।

अन्त्य १५.१८ – [विशाखा से श्रीमती राधारानी ने कहा] “हे सखी! मैं अपनी इन्द्रियों पर क्रोधित नहीं हो सकती, क्या उनका दोष है? कृष्ण की सौंदर्य, शब्द, स्पर्श, सुगन्ध और स्वाद – अत्यन्त आकर्षक हैं और उनकी ये पाँचों लक्षण मेरी इन्द्रियों को आकर्षित कर रहे हैं। मेरे अकेले मन को मेरी हर एक इन्द्रिय अलग-अलग दिशाओं में खींच रही हैं”।

अन्त्य १५.२१ – “कृष्ण की शरीर इतना शीतल है कि में क्या कह सकती हूँ, उसको चंदन के लेप या करोड़ों-करोड़ों चंद्रमा से भी तुलना नहीं कर सकते”।

अन्त्य १५.२२ – “उनके शरीर की सुगंध कस्तूरी से भी अधिक मादक है और वह नीलकमल की सुगंध को भी पराजित करती है”।

अन्त्य १५.२४, २५ – “हे सखी! कृपया सुनो! मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ उन्हें मिलने के लिए? कृपया बताओ!”। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु दिन-प्रतिदिन स्वरुप दामोदर गोस्वामी और रामानंद राय के साथ विलाप करते थे।

अन्त्य १५.२६ – श्री चैतन्य महाप्रभु की भाव-आवेश को पुष्ट करने के लिये स्वरुप दामोदर गोस्वामी शोभनीय गीत गाते थे और रामानंद राय उपयुक्त श्लोक सुनाते थे। इस तरह वे दोनों श्री चैतन्य महाप्रभु को सांत्वना देते थे।

अन्त्य १५.२७ – श्री चैतन्य महाप्रभु विशेष रूप से बिल्वमंगल ठाकुर के कृष्ण कर्णामृत, विद्यापति की कविता और जयदेव गोस्वामी के गीत-गोविन्द को सुनना पसंद करते थे। जब इन पुस्तकों से स्वरुप दामोदर गोस्वामी और रामानंद राय श्लोक सुनाते और गीत गाते, तब श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे।

अन्त्य १५.२८ – एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु समुद्र के किनारे से जा रहे थे, तब वे अचानक एक पुष्पवाटिका को देखे।

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अन्त्य १५.२९ – श्री चैतन्य महाप्रभु उस पुष्पवाटिका को वृन्दावन समझकर तेजी से उसमें प्रवेश किये और कृष्ण के अत्यन्त विरह में वे निमग्न होकर उन्हें खोजने लगे।

अन्त्य १५.३० – जब रास नृत्य के समय श्रीमती राधारानी के साथ कृष्ण अदृश्य हो गये थे, तब गोपियों उन्हें खोजते हुए जंगल में घुमते रहे वैसे ही श्री चैतन्य महाप्रभु उस पुष्पवाटिका में घुमते रहे।

अन्त्य १५.३१ – श्री चैतन्य महाप्रभु गोपियों के भाव में निमग्न होकर इधर-उधर घुमते हुए सारे वृक्षों और लताओं से गोपियों गाये गए श्लोक सुना-सुनाकर कृष्ण के बारे में पूछने लगे।

अन्त्य १५.३२, ३६ – [गोपियों ने वृक्षों से कहा] “ओह चूत्त् (एक प्रकार की आम का वृक्ष), प्रियाल, पनस, आसन, कोविदार, कदम्ब और निप तथा यमुना के तट पर खड़े हुए सभी वृक्षों! कृपया बताओ कृष्ण कहाँ गये है? हमने हमारी मन को खो चुकी है और हमारे प्राण निकल रहा हैं। कृपया बताओ! किस रास्ते पर वे गये है और हमारे प्राण बचाओ!”।

अन्त्य १५.३७ – “वृक्षों ने जब कोई जवाब नहीं दिया, तब गोपियों ने अनुमान लगाया कि “ये सारे वृक्षों पुरुष जाती का हैं, ये सब कृष्ण के मित्र होंगे”।

अन्त्य १५.३८ – “ये क्यों हमें बताएँगे कृष्ण कहाँ गये हैं? चलो हम इन लताओं से पूछेंगे ये सब स्त्री जाती का हैं, हमारी सखियाँ जैसी हैं”।

अन्त्य १५.३९ – “ये अवश्य ही हमें बतायेंगी कृष्ण कहाँ गये हैं”। इस तरह गोपियों अनुमान लगाते हुए तुलसी तथा लताओं से पूछने लगी।

अन्त्य १५.४० – “तुलसी! मालती! यूथी! माधवी! मल्लिका! आप सब कृष्ण के बहुत प्रिय हैं, वे अवश्य ही आपके निकट आये होंगे”।

अन्त्य १५.४१ – आप सब हमारी सखियाँ जैसी है, कृपया बताओ किस रास्ते पर कृष्ण गये है और हमारे प्राण बचाओ!”।

अन्त्य १५.४२ – इस प्रकार विनती करने के बाद भी जब उनसे कोई जवाब नहीं मिला, तब गोपियों ने अनुमान लगाया कि “ये सब कृष्ण की दासियाँ होंगी, हमें नहीं बतायेंगी कृष्ण कहा गये है”।

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अन्त्य १५.५५ – इस तरह कहते हुए गोपियों जब यमुना नदी के तट पर आयें, तब उन्होंने एक कदम्ब वृक्ष के नीचे कृष्ण को देखा।

अन्त्य १५.५६ – करोड़ो-करोड़ो कामदेवों को भी मोहित करने वाले कृष्ण वहाँ पर अपने होठों पर वंशी रखते हुए खड़े और वे अपनी सौंदर्य से संपूर्ण विश्व को आकर्षित कर रहे थे।

अन्त्य १५.५७ – जब कृष्ण के सौंदर्य को श्री चैतन्य महाप्रभु देखे, तब वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उसी समय स्वरुप दामोदर गोस्वामी और सभी भक्तगण उस पुष्पवाटिका में पधारे।

अन्त्य १५.५८ – श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में वे सब पहले जैसे ही कृष्ण-प्रेम की सभी भावलक्षणों को देख पाए। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु बहिरंग रूप से विचलित लग रहे थे, किंतु अन्तरंग रूप से वे दिव्य-आनंद का अनुभव कर रहे थे।

अन्त्य १५.५९, ६० – वे सब बहुत समय प्रयास करने के बाद, महाप्रभु को होश में ला पाए। श्री चैतन्य महाप्रभु होश में आने के बाद इधर उधर घुमते हुए चारो ओर ढूँढने लगे और इस तरह कहने लगे, “मेरे कृष्ण कहाँ गये? अभी मैं देख रहा था, वे अपने सौंदर्य से मेरे मन और नेत्रों को मोहित कर लिए”।

अन्त्य १५.६१ – “मैं होठों पर बंसी रखे हुए कृष्ण को क्यों नहीं देख पा रहा हूँ?”

अन्त्य १५.८२ – इस तरह विलाप करने के बाद, महाप्रभु ने स्वरुप दामोदर गोस्वामी से कहा, “कृपया आप एक मधुर गीत गाओ, जो मेरे ह्रदय को चेतना ला सके”।

अन्त्य १५.८३ – स्वरुप दामोदर गोस्वामी ने महाप्रभु की प्रसन्नता के लिए अत्यन्त मधुर स्वर में गीत गोविन्द का एक पद गाया।

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अन्त्य १५.८५ – इस विशेष पद को स्वरुप दामोदर गोस्वामी जब गा रहे थे, तब भाव-आवेश में श्री चैतन्य महाप्रभु उठकर नृत्य करने लगे।

अन्त्य १५.८६ – उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में आठों प्रकार की सात्त्विक विकार प्रकट होने लगे और तैतिस प्रकार की व्यभिचारी भाव भी प्रकट होने लगे, शोक तथा हर्ष इत्यादि।

अन्त्य १५.८७ – महाप्रभु के शरीर में भावोदय, भावसन्धि, भवशाबल्य जैसे भाव लक्षण उदय होने लगे।

अन्त्य १५.८८ – बारम्बार महाप्रभु ने उसी श्लोक को गाने के लिए स्वरुप दामोदर गोस्वामी से कहा। जब वे उस श्लोक को हर बार गा रहे थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु नये-नये स्वाद का हर बार अनुभव कर रहे थे और नृत्य कर रहे थे।

अन्त्य १५.८९ – जब इस तरह महाप्रभु बहुत देर तक नृत्य कर रहे थे। तब स्वरुप दामोदर गोस्वामी ने श्लोक गाना बन्द कर दिया।

अन्त्य १५.९० – भाव-आवेश में श्री चैतन्य महाप्रभु बारम्बार कहने लगे, “गाते रहो! गाते रहो!” किंतु स्वरुप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु की थकान को देखकर नहीं गाया।

अन्त्य १५.९१ – जब श्री चैतन्य महाप्रभु को “गाते रहो! गाते रहो!” कहते हुए सभी भक्तगणों ने सुना, तब श्री चैतन्य महाप्रभु के चारों ओर वे सब एकत्र होकर एकता हरिनाम संकीर्तन करने लगे।

अन्त्य १५.९२, ९३ – श्री चैतन्य महाप्रभु को बैठाकर रामानंद राय ने पंखे से उनकी थकान को दूर की। उसके बाद, सभी भक्तगण स्नान कराने के लिए महाप्रभु को समुद्र के तट पर ले गये।

अन्त्य १५.९४ – सभी भक्तगण महाप्रभु को दोपहर का भोजन कराने के बाद उन्हें विश्राम कराने के लिए एक उत्तम बिस्तर पर ले गये। उसके बाद, रामानंद राय और सभी भक्तगण अपने-अपने घर वापस चले गये।

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अन्त्य १५.९८ – श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनंत हैं, इसको पूरा लिख पाना असंभव है। मैंने थोड़ा सा लिखकर उसको परिचय देने का प्रयास किया है।

अन्त्य १५.९९ – श्रीरूप-रघुनाथ के चरणकमलों में सदैव प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

[यदि (श्री चैतन्य महाप्रभु, श्रीमती राधारानी और गोपियों द्वारा प्रस्तुत किये हुए) इस आकर्षण लीलाओं के माध्यम से हम कृष्ण के प्रति आकर्षित हो जायेंगे, तो सभी प्रकार की सांसारिक आकर्षण से तत्काल हम मुक्त हो जायेंगे और कृष्ण-प्रेम को प्राप्त कर पायेंगे। – SB 10.33.39

कृष्ण के प्रति ऐसी उच्च कोटि आकर्षण केवल गोलोकेर-प्रेमधन हरीनाम संकीर्तन के माध्यम से ही साध्य है।]

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

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